Friday, July 17, 2020

** MISSION ADMISSION ** बारावी नंतर काय विद्यार्थ्यांसाठी खास पोस्ट........!


 

*मेडीकल* प्रवेशासाठी लागणारी  कागदपत्रे
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1) *नीट* आँनलाईन *फाँर्म* प्रिंट
2) *नीटप्रवेश* पत्र 
3) *नीट मार्क* लिस्ट
4)10 वी चा मार्क मेमो
5)10 वी सनद
6) 12वी मार्क मेमो
7) नँशनँलीटी सर्टीफिकेट
8 रहिवाशी प्रमाणपत्र
9)12 वी टी सी
10) मेडिकल सर्टिफिकेट फिटनेस
11) आधार कार्ड
12) उत्पन्न प्रमाणपत्र किंवा फाँर्म नं 16 वडिलांचा
13) मुलाचे राष्ट्रीय बँकेतील खाते
14) मुलाचे तसेच आई व वडिलांचे दोघांचे पँन कार्ड
मागासवर्गीयांसाठीवरील सर्व व खालील प्रमाणपत्रे
1) जातीचे प्रमाणपत्र
2) जात वैधता प्रमाणपत्र
3) नाँन क्रिमीलीयर प्रमाणपत्र 
( मागील काढलेले असेल तर 31 मार्च2021 पर्यत लागू)
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कृपया वरील कागदपत्रे अपुर्ण असतील तर त्वरीत पुर्ण करून घ्यावे.
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👉🏿 *इंजिनीअरिंग* प्रवेशासाठी लागणारी कागदपत्रे👈🏿
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1) *MHT-CET* आँनलाईन *फाँर्म* प्रिंट
2) MHT-CET* पत्र 
3) MHT-CET* मार्क  लिस्ट
4)10 वी चा मार्क मेमो
5)10 वी सनद
6) 12वी मार्क मेमो
7) नँशनँलीटी सर्टीफिकेट
8 ) रहिवाशी प्रमाणपत्र
9)12 वी टी सी
10) आधार कार्ड
11) उत्पन्न प्रमाणपत्र किंवा फाँर्म नं 16 वडिलांचा
12) राष्ट्रीय बँकेतील खाते                                         13) फोटो.

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*मागासवर्गीयांसाठीवरील सर्व व खालील प्रमाणपत्रे*
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1) जातीचे प्रमाणपत्र
2) जात वैधता प्रमाणपत्र
3) नाँन क्रिमीलीयर प्रमाणपत्र 
( मागील काढलेले असेल तर 31 मार्च2021 पर्यत लागू)

कृपया वरील कागदपत्रे अपुर्ण असतील तर त्वरीत पुर्ण करून घ्यावे
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*वैद्यकीय क्षेत्र* 
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*शिक्षण - एमबीबीएस*  
कालावधी - पाच वर्षे सहा महिने 
पात्रता व प्रवेश - बारावी शास्त्र आणि NEETप्रवेश परीक्षा 
संधी कोठे? - स्वतःचा वैद्यकीय व्यवसाय, रुग्णालयात नोकरी 
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पुढील उच्च शिक्षण - एमडी, एमएस व इतर पदविका 
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*शिक्षण - बीएएमएस* 
कालावधी - पाच वर्षे सहा महिने 
पात्रता व प्रवेश - बारावी शास्त्र, NEET
संधी कोठे? - स्वतःचा वैद्यकीय व्यवसाय, रुग्णालयात नोकरी 
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पुढील उच्च शिक्षण - एमडी, एमएस व इतर पदविका 
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*शिक्षण - बीएचएमएस* 
कालावधी - पाच वर्षे सहा महिने 
पात्रता व प्रवेश - बारावी शास्त्र, NEET
संधी कोठे? - स्वतःचा वैद्यकीय व्यवसाय, रुग्णालयात नोकरी 
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पुढील उच्च शिक्षण - एमडी 
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*शिक्षण - बीयूएमएस* 
कालावधी - पाच वर्षे सहा महिने 
पात्रता व प्रवेश - बारावी शास्त्र, NEET
संधी कोठे? - स्वतःचा वैद्यकीय व्यवसाय, रुग्णालयात नोकरी.
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पुढील उच्च शिक्षण - पदव्युत्तर शिक्षण 
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*शिक्षण - बीडीएस* 
कालावधी - चार वर्षे 
पात्रता व प्रवेश - बारावी शास्त्र, NEET
संधी कोठे? - स्वतःचा वैद्यकीय व्यवसाय, रुग्णालयात नोकरी 
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पुढील उच्च शिक्षण - एमडीएस 
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*शिक्षण - बीएससी इन नर्सिंग* 
कालावधी - चार वर्षे 
पात्रता व प्रवेश - बारावी शास्त्र NEET
संधी कोठे? - रुग्णालयात नर्स म्हणून नोकरी .
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पुढील उच्च शिक्षण - पदव्युत्तर शिक्षण 
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*शिक्षण - बीव्हीएससी ऍण्ड एएच* 
कालावधी - पाच वर्षे 
पात्रता व प्रवेश - बारावी शास्त्र NEET
संधी कोठे? - प्राणी, जनावर रुग्णालयात नोकरी, प्राणी संग्रहालय, अभयारण्यात नोकरी, स्वतःचा व्यवसाय 
पुढील उच्च शिक्षण - पदव्युत्तर शिक्षण 

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*शिक्षण - डिफार्म* 
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कालावधी - तीन वर्षे 
पात्रता व प्रवेश - बारावी शास्त्र, थेट प्रवेश 
संधी कोठे? - औषधनिर्मिती कारखान्यात नोकरी, स्वतःचा व्यवसाय.
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पुढील उच्च शिक्षण - बीफार्म 
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*शिक्षण - बीफार्म* 
कालावधी - चार वर्षे 
पात्रता व प्रवेश - बारावी शास्त्र, सीईटी 
संधी कोठे? - औषध कंपनी किंवा औषध संशोधन संस्था इत्यादी ठिकाणी नोकरी, स्वतःचा व्यवसाय, नागरी सेवा परीक्षा 
पुढील उच्च शिक्षण - एमफार्म 
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संरक्षण दलांत प्रवेशासाठी 
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केंद्रीय लोकसेवा आयोगामार्फत (यूपीएससी) वर्षातून एनडीए (एक) व एनडीए (दोन) अशा दोन वेळा लेखी परीक्षा होतात. 
एअर फोर्स व नेव्हीसाठी जे उमेदवार राज्य शिक्षण मंडळाची किंवा मान्यताप्राप्त विद्यापीठाची बारावी परीक्षा भौतिकशास्त्र व गणित या विषयांसह उत्तीर्ण आहेत किंवा त्या परीक्षेस बसलेले आहेत, असे उमेदवार परीक्षेसाठी पात्र ठरतात. 
वयोमर्यादा : साडेसोळा ते 19 वर्षांदरम्यान वय असलेले उमेदवार अर्ज करू शकतात.
 
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*अभियांत्रिकी व ऑटोमोबाईल*
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*शिक्षण - इंजिनिअरिंग डिप्लोमा* 
कालावधी - तीन वर्षे 
पात्रता व प्रवेश परीक्षा - बारावी शास्त्र, थेट दुसऱ्या वर्गात प्रवेश 
संधी कोठे? - आयटी औद्योगिक क्षेत्रात, उद्योग किंवा व्यवसाय, स्वयंरोजगार 
पुढील उच्च शिक्षण - बीईच्या दुसऱ्या वर्षात प्रवेश 
*शिक्षण - बीई* 
कालावधी - चार वर्षे 
पात्रता व प्रवेश - बारावी शास्त्र, सीईटी 
संधी कोठे? - स्वतःचा व्यवसाय, आयटी, औद्योगिक क्षेत्र, संशोधन संस्था, नागरी सेवा परीक्षा, अभियांत्रिकी सेवा परीक्षा 
पुढील उच्च शिक्षण - एमई, एमटेक, एमबीए; तसेच जीआरई देऊन परदेशात एमएस 
*शिक्षण - बीटेक* 
कालावधी - चार वर्षे 
पात्रता व प्रवेश - बारावी शास्त्र, आयआयटी जेईई, एआयईईई 
संधी कोठे? - औद्योगिक क्षेत्र, सरकारी उद्योग, खासगी उद्योग, संशोधन संस्था, आयटी क्षेत्र, नागरी सेवा व अभियांत्रिकी सेवा परीक्षा, स्वयंरोजगार 
पुढील उच्च शिक्षण - एमई, एमटेक, एमबीए किंवा जीआरई देऊन परदेशात एमएस 
शिक्षण - ऑटोमोबाईल अभियांत्रिकी पदवी - 
कालावधी - चार वर्षे 
पात्रता - बारावी शास्त्र, सीईटी 
शिक्षण - ऑटोमोबाईल अभियांत्रिकी पदव्युत्तर शिक्षण 
कालावधी - दोन वर्षे 
पात्रता - बीई, ऑटोमोबाईल, मॅकेनिकल, उत्पादन, तत्सम शिक्षण 
बारावी नंतर काय विद्यार्थ्यांसाठी खास पोस्ट...................!* 


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 *कॉम्प्युटरमधील कोर्सेस* 
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डीओईएसीसी "ओ' लेव्हल 
कालावधी - एक वर्ष ऊजएअउउ 
डिप्लोमा इन ऍडव्हान्स्ड सॉफ्टवेअर टेक्‍नॉलॉजी 
कालावधी - दोन वर्षे 
सर्टिफिकेट कोर्स इन इन्फर्मेशन टेक्‍नॉलॉजी 
कालावधी - सहा महिने 
सर्टिफिकेट इन कॉम्प्युटर ऍप्लिकेशन 
कालावधी - तीन महिने 
सर्टिफिकेट इन कॉम्प्युटिंग 
कालावधी - दहा महिने 
इग्नू युनिव्हर्सिटी 
सर्टिफिकेट कोर्स इन कॉम्प्युटर प्रोग्रॅमिंग 
कालावधी - एक वर्ष 
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*शिक्षण - बारावी*
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*शास्त्र कॉम्प्युटर ऍप्लिकेशन* 
कालावधी - एक वर्ष 
वेब डिझाईनिंग ऍण्ड वेब डेव्हलपमेंट 
कालावधी - दोन महिने 
कॉम्प्युटर ऑपरेटर ऍण्ड प्रोग्रॅम असिस्टन्स 
कालावधी - एक वर्ष 
(फक्त मुलींसाठी) 
डिप्लोमा इन ऍडव्हर्टायझिंग ऍण्ड ग्राफिक डिझाईनिंग 
कालावधी - दोन वर्षे 
गेम डिझाईन ऍण्ड डेव्हलपमेंट 
कालावधी - एक वर्ष 
प्रिंट इमेजिंग ऍण्ड पब्लिशिंग, कार्टून ऍनिमेशन, ई-कॉम डेव्हलपमेंट, वेब ग्राफिक्‍स ऍण्ड ऍनिमेशन 
कालावधी - एक वर्ष 
कॉम्प्युटर ऑपरेटर ऍण्ड प्रोग्रॅमिंग असिस्टंट 
कालावधी - एक वर्ष 
डेस्क टॉप पब्लिशिंग ऑपरेटर 
कालावधी - एक वर्ष 
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 *रोजगाराभिमुख कोर्सेस*
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*शिक्षण - डिप्लोमा इन प्लॅस्टिक मोल्ड टेक्‍नॉलॉजी* 
कालावधी - तीन वर्षे 
पात्रता - बारावी (70 टक्के) 
संधी कोठे? - प्लॅस्टिक आणि मोल्ड 
इंडस्ट्रीमध्ये संधी, सिंगापूर, मलेशियामध्ये संधी 
उच्च शिक्षण - पदव्युत्तर शिक्षण 
कोठे? सेंट्रल इन्स्टिट्यूशन ऑफ प्लॅस्टिक्‍स 
इंजिनिअरिंग ऍण्ड टेक्‍नॉलॉजी, म्हैसूर 
*शिक्षण - टूल ऍण्ड डाय मेकिंग* 
कालावधी - चार वर्षे 
पात्रता - दहावी आणि बारावी पास 
संधी - टूल ऍण्ड डाय इंडस्ट्री, भारत आणि मलेशियाशियामध्ये भरपूर संधी गव्हर्नमेंट टूल रूम ऍण्ड ट्रेनिंग सेंटर 
(जीटीटीसी), नेट्टूर टेक्‍नॉलॉजी ट्रेनिंग 
फाउंडेशन (एनटीटीएफ) 
सेक्रेटरीअल प्रॅक्‍टिस 
कालावधी - एक वर्ष 
फॅशन टेक्‍नॉलॉजी 
कालावधी - एक वर्ष 
मॉडर्न ऑफिस प्रॅक्‍टिस 
कालावधी - तीन वर्षे 

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*हॉस्पिटॅलिटी ऍण्ड टुरिझम*
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*टूरिस्ट गाइड* 
कालावधी - सहा महिने 
डिप्लोमा इन फूड ऍण्ड बेव्हरेज सर्व्हिस 
कालावधी - दीड वर्ष 
बेसिक कोर्स ऑन ट्रॅव्हल फेअर ऍण्ड टिकेटिंग 
कालावधी - तीन महिने 
बेसिक कोर्स इन कॉम्प्युटराइज्ड रिझर्व्हेशन 
सिस्टम (एअर टिकेटिंग) 
कालावधी - एक महिना 
अप्रेन्टाईसशिप 
कालावधी - पाच महिने ते चार वर्षे 
*शिक्षण - व्होकेशनल स्ट्रिममध्ये बारावी* 
डिजिटल फोटोग्राफी 
कालावधी - एक वर्ष 
स्टोअर कीपिंग ऍण्ड पर्चेसिंग 
कालावधी - एक ते तीन वर्षे 
सेल्स ऍण्ड अकाउंटन्सी 
कालावधी - एक ते तीन वर्षे.
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*बांधकाम व्यवसाय*
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*शिक्षण - बीआर्च* 
कालावधी - पाच वर्षे 
पात्रता व प्रवेश - बारावी शास्त्र,NATA , JEE
संधी कोठे? - स्वतःचा व्यवसाय किंवा बांधकाम उद्योगांमध्ये नोकरी, नागरी सेवा परीक्षा 
पुढील उच्च शिक्षण - एमआर्च, एमटेक  
*पारंपरिक कोर्सेस*
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*शिक्षण - बीएससी* 
कालावधी - तीन वर्षे 
पात्रता व प्रवेश - बारावी शास्त्र, प्रवेश थेट 
संधी कोठे? - आयटी, औद्योगिक क्षेत्र, संशोधन संस्था, नागरी सेवा परीक्षा, स्वयंरोजगार 
पुढील उच्च शिक्षण - एमएससी, एमबीए, एमसीए, एमपीएम इत्यादी.
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*शिक्षण - बीएससी(Agri)* 
कालावधी - 4 वर्षे 
पात्रता व प्रवेश - बारावी शास्त्र व CET
संधी कोठे? - कृषी उद्योग कारखान्यात नोकरी, सरकारी कृषी सेवा नोकरी, नागरी सेवा परीक्षा, शेती व्यवसाय 
पुढील उच्च शिक्षण - एमएससी (ऍग्रो), राष्ट्रीय कृषी परिषद संस्थांमध्ये संशोधन 
--By 
*शिक्षण - बीए* 
कालावधी - तीन वर्षे 
संधी कोठे? - नोकरीसाठी व्यावसायिक, मृदू कौशल्ये, प्रमाणपत्र अथवा पदविका अभ्यासक्रम बीए करतेवेळी जास्त फायदेशीर. नागरी सेवा परीक्षा, स्वयंरोजगार 
पुढील शिक्षण - एमए, एमबीए, पत्रकारिता, पदविका, एलएलबी
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*शिक्षण - बीकॉम* 
कालावधी - तीन वर्षे 
संधी कोठे? - आयसीडब्ल्यूए, सीए, सीएस परीक्षांचा अभ्यास बीकॉम करताना देणे फायदेशीर, नागरी सेवा परीक्षा, स्वयंरोजगार, लेखापाल म्हणून नोकरी 
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*शिक्षण - बीएसएल* 
कालावधी - पाच वर्षे 
संधी कोठे? - विधी व्यवसाय, विधी सल्लागार, नागरी सेवा परीक्षा, न्याय सेवा 
पुढील उच्च शिक्षण - एलएलएम 
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*शिक्षण - डीएड* 
कालावधी - दोन वर्षे 
प्रवेश - सीईटी आवश्‍यक 
संधी कोठे? - प्राथमिक शिक्षण शिक्षक 
पुढील उच्च शिक्षण - बीए, बीकॉम व नंतर बीएड 
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*शिक्षण - बीबीए,* बीसीए,बीबीएम 
कालावधी - तीन वर्षे 
प्रवेश - सीईटी 
संधी कोठे? - औद्योगिक क्षेत्रात नोकरी, आयटी क्षेत्रात नोकरी, स्वयंरोजगार, नागरी सेवा परीक्षा 
पुढील उच्च शिक्षण - एमबीए, एमपीएम, एमसीए  

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*फॉरेन लॅंग्वेज* 
(जर्मन, फ्रेंच, रशियन, स्पॅनिश, चायनीज, 
जॅपनीज, कोरियन) 
कालावधी ः बेसिक, सर्टिफिकेट किंवा इतर 
कोर्सेसवर आधारित
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 *फॉर्म भरताना हे लक्षात ठेवा.......*
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अर्ज भरायला जाताना मार्कलिस्ट, जातीचा दाखला, नागरिकत्व, आधार कार्ड आणि घराच्या पत्त्याच्या पुराव्याची अटेस्टेड कॉपी न्यायला विसरू नका. 
पासपोर्ट आकाराचा फोटो, डिंक, त्याचबरोबर कागदपत्रे जोडण्यासाठी स्टेपलर जवळ ठेवा. 
विद्यार्थ्यांचे नाव, पत्ता, ई-मेल, नागरिकत्व, जन्मतारीख, जन्मस्थळ इत्यादीची माहिती अर्जात दिलेल्या पद्धतीनेच भरावी. उदा.- आडनाव, पालकांचे नाव, स्वतःचे नाव योग्य रकान्यातच लिहावे. इंग्रजीमध्ये अर्ज भरल्यास तो कॅपिटल लेटरमध्ये भरावा. 

अर्ज चुकू नये म्हणून सुरवातीला त्याच्या झेरॉक्‍सवर माहिती भरा. त्यानंतर अर्जात ती माहिती भरा. एखादा मुद्दा न कळल्यास मार्गदर्शन घ्या. 

अर्ज भरायच्या तारखा आणि वेळापत्रकाचे कसोशीने पालन करा. 

इतर क्षेत्रांमध्ये मिळवलेल्या प्रमाणपत्रांच्या अटेस्टेड कॉपी बरोबर ठेवा. 

काही महाविद्यालयांमध्ये प्रश्‍नावली भरावी लागते. त्यामध्ये तुम्हाला याच महाविद्यालयामध्ये प्रवेश का हवा, ठराविकच शाखा का, रोल मॉडेल कोण, करिक्‍युलर ऍक्‍टिव्हिटीजबाबत अनेक प्रश्‍न असतात. अशा प्रश्‍नांवरील उत्तरांचा आधीच विचार करून ठेवा. 
बऱ्याच वेळेला ऑनलाइन अर्जप्रक्रिया पूर्ण करायच्या असतात. त्यासाठी संबंधित कागदपत्रे स्कॅन करा. ते पेनड्राइव्हवर सेव्ह करून ठेवा आणि तो आपल्या जवळ बाळगा. 
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*काही महत्त्वाची संकेतस्थळे*
 
1) तंत्रशिक्षण संचालनालय, महाराष्ट्र शासन. 
(अभियांत्रिकी, वास्तुशास्त्र, औषधनिर्माण शास्त्र, हॉटेल मॅनेजमेंट आदी) 
www.dte.org.in 
2) वैद्यकीय शिक्षण आणि संशोधन संचालनालय, महाराष्ट्र शासन (वैद्यकीय शिक्षणासंबंधी) 
www.dmer.org
3) व्यवसाय शिक्षण व प्रशिक्षण संचालनालय, महाराष्ट्र शासन (औद्योगिक प्रशिक्षणासाठी) 
www.dvet.gov.in
4) पारंपरिक पदवी शिक्षण, पुणे विद्यापीठ 
www.unipune.ac.in
5) भारतीय प्रौद्योगिक संस्था (आयआयटी), मुंबई 
आयआयटी, जेईईसंबंधी (बी. टेक पदवी) 
www.iitb.ac.in 
6) केंद्रीय माध्यमिक शिक्षण मंडळ (सीबीएसई) "एआयईईई‘संबंधी अभियांत्रिकी शिक्षण 
www.aipmt.nic.in 
7) एनडीए प्रवेश परीक्षेणसंबंधी केंद्रीय लोकसेवा आयोगय (यूपीएससी) 
www.upsc.gov.in वरील माहिती आपल्या मित्र,नातेवाईक,पाल्य,विद्यार्थी, यांना पाठवा.
🙏🏻👍
By 
       Dr.Ghapesh Pundalikrao Dhawale Nagpur
            ghapesh84@gmail.com
            8600044560
सोंजंन्य
     AIDSO

वात्सववादी साहित्यीक अन्ना भाऊ..

तुकाराम भाऊराव साठे म्हणजेच आण्णा भाऊ साठे यांचा जन्म (१ ऑगस्ट १९२० - १८ जुलै १९६९) सांगली जिल्ह्यात वाळवा तालुक्यात वाटेगाव या गावी झाला. अण्णाभाऊ शाळेत शिकले नाहीत. ते केवळ दीड दिवस शाळेत गेले होते. मात्र शाळेत शिक्षकांकडून होणारी मारहाण, अपमानास्पद वागणूक यामुळे त्यांनी शाळा सोडून दिली. ते परत शाळेत गेलेच नाही. लहानपणीच  त्यांना जातिव्यवस्थेचे चटके सोसावे लागले. पोटापाण्यासाठी त्यांनी चालतच मुंबई गाठली. मुंबईत असताना चळवळींशी त्यांचा संबंध आला. दत्ता गवाणकर आणि अमर शेख या शाहिरांसोबत त्यांनी 'लाल बावटा' हे कला पथक स्थापन केले. संयुक्त महाराष्ट्र चळवळीत त्यांचा सक्रिय सहभाग होता. त्यासोबतच अनेक कथा, कादंबऱ्या, पोवाडे त्यांनी सामाजिक आणि राजकीय परिस्थितीशी जोडत लिहिले. त्यांची गाजलेली कादंबरी म्हणजे 'फकीरा' होय. त्यांच्या साहित्यात जगण्याचा संघर्ष होता, स्वतः अनुभवलेलं आयुष्य त्यांनी आपल्या साहित्यातून मांडले. त्यांनी लिखाणातून चित्रा, वैजंता अशा सशक्त नायिका उभ्या केल्या. पहिल्या दलित साहित्य संमेलनाचे उद्घाटन त्यांच्या हस्ते झाले, त्यात त्यांनी उच्चारलेले वाक्य होते, "ही पृथ्वी श्रमिक आणि दलितांच्या तळहातावर तरलेली आहे". आचार्य अत्रे यांनी म्हटलं होतं, जगण्यासाठी मरणाऱ्या माणसांची कथा अण्णाभाऊंनी लिहिली.  
लोकशाहीर आण्णा भाऊ साठेंना स्मृतिदिनी विनम्र अभिवादन!

By 
Dr Ghapesh Dhawale Nagpur
      ghapesh84@gmail.com
       M. 8600044560

Wednesday, July 15, 2020

स्वातंत्र लढ्यातील योद्धा..

भारताच्या स्वातंत्र्यलढ्याच्या चळवळीत अनेकांचेविशेषकरून
 महिलांचे  योगदान पडदद्यामगे गेलेले दिसते. त्यातलेच एक नाव म्हणजे अरूणा असफ अली होय. यांचा भारताच्या स्वातंत्र्य चळवळीत विशेषकरून १९४२ च्या भारत छोडो आंदोलनात सक्रिय सहभाग होता. त्यांचे व्यक्तीमत्व झुजारू आणि प्रेरणा देणारे आहे. ज्या उर्मीने त्यांनी आपला जीवनकाळ समाजासाठी काम करण्यात घालवला होता. त्याकाळात जे चुकीचे वाटले त्याविरोधात त्या बोलल्या जसे की १९३२ मधे तिहार जेलमध्ये असताना त्यांनी राजकीय कैद्यांना मिळणाऱ्या भेदभावाच्या विरोधात 'हंगर स्ट्राईक' केली होती. अरूणा यांचा जन्म एका ब्राम्हो कुटुंबात झाला होता. वैयक्तीक आयुष्यातही त्यांनी बंड केले. त्यांनी जाती- धर्माची बंधने तोडून घरच्यांचा विरोध असतानाही असफ अली यांच्याशी लग्न केले. त्यांचे सामाजिक आणि वैयक्तिक आयुष्य एकमेकांशी सुसंगत आणि सुसंवादी होते. आज आपल्यापैकी किती जणांचे आयुष्य असे सुसंगत असते हे ज्यानी-त्यानी स्वतःला विचारण्याजोगा प्रश्न आहे. जस उदाहरण द्यायचे झाले तर अनेकजण फक्त म्हणतात कि मी हुंड्याच्या विरोधात आहे पण प्रत्यक्षात वेगळ्या स्वरूपात हुंडा घेऊन लग्न करताना दिसतात. दुसरे उदाहरण म्हणजे अनेकजण म्हणतात कि आम्ही जातीवरून भेदभाव करत नाही मात्र त्यांच्या प्रत्यक्ष कृतीत जातीतच लग्न केलेले दिसते. हे बदलायची गरज आहे. अरूणा यांनी या सुसंगतपणाचे मर्म जाणले होते. पुढे त्या कॉग्रेस पार्टीच्या मेंबर झाल्या होत्या. १९४२ च्या आंदोलनात जेव्हा कॉंग्रेसच्या प्रमुख नेत्यांना इंग्रज सरकारने अटक केली होती तेव्हा पुढाकार घेवून त्यांनी भारत छोडो आंदोलनाचा समारोप केला होता. यावरून त्यांच्यातील नेतृत्व कौशल्य दिसते. त्यांना भारताच्या स्वातंत्र्य लढ्यातील "ग्रॅंड ओल्ड लेडी" म्हणून ओळखले जाते. त्यांच्याकडून प्रेरणा घेवून आजच्या प्रश्नावर आपण बोलले पाहिजे, लढले पाहिजे. आत्ताचा ताजा मुद्दा म्हणजे नागरिकत्वसंशोधन विधेयकाविरोधात शांतीपूर्ण आणि संवैधानिक मार्गाने काम करणाऱ्या विद्यार्थी आणि आंदोलकांना खोट्या केसेस मधे फसवून जे अटकसत्र सरकारने चालवले आहे त्याचा विरोध आपण सर्वांनी मिळून केला पाहिजे. तरच भारताच्या स्वातंत्र्य लढ्यातील अनेकांचे योगदान सार्थक होइल आणि संविधानाच्या रूपाने स्वातंत्र्य लढ्यातून जन्म घेतलेल्या बंधुता, जगण्याचा हक्क, विरोध करण्याचा अधिकार, अभिव्यक्ती स्वातंत्र्य यांची गळचेपी होउ न देता त्यांचे संवर्धन करण्याची जबाबदारी प्रत्येक भारतीय नागरीकाची आहे. यासाठी प्रेरण्या देणाऱ्या झुझारू, लढाऊ नेतृत्व असणाऱ्या अरुणा असफ अली यांना विनम्र अभिवादन!

#ArunaAsafAli #FreedomStruggle #

By
Dr Ghapesh Pundalikrao Dhawale,
      ghapesh84@gmaul.com
      M. 8600044560

Thursday, June 18, 2020

क्या चीनी सामान का बॉयकॉट किया जा सकता है?


आज भारत-चीन सीमा पर तनाव के समय कुछ लोग अपना पुराना टीवी सड़कों पर पटक विरोध जता रहे हैं। चीनी सामान का बॉयकॉट करने के लिए जो पहली शर्त है, वह यह है कि हमें पता होना चाहिए कि कौन-कौन से सामान में चीन के पैसे लगे हैं। तो इसे जानने के लिए आपको अच्छा-खासा इकोनोमिक एक्सपर्ट बनने की ज़रूरत पड़ेगी। किस भारतीय प्रॉडक्ट में चीन की एसेसरीज लगी है और किस चीनी प्रॉडक्ट की फैक्ट्री भारत में लगी है, जहां भारतीयों का पैसा लगा है और उन्हें काम मिल रहा है, यह पूरी तरह से पता लगाना एक  जटिल काम है। आम आदमी के लिए ये बेहद मुश्किल है। 

- पेटीएम, पेटीएम मॉल, बिग बास्केट, ड्रीम 11, स्नैपडील,फ्लिपकार्ट, ओला, मेक माई ट्रिप, स्विगी, 
जोमेटो जैसी स्टार्टअप कंपनियों  में चीन की अलीबाबा और टेंसट होल्डिंग कंपनी की बड़ी हिस्सेदारी है। 

- भारत में  पिछले पांच साल में स्टार्टअप कंपनियों में चीन ने 4 बिलियन डॉलर यानी 30,000 करोड़ से ज्यादा का इन्वेस्टमेंट किया है, जो कुल इन्वेस्टमेंट का 2/3 भाग है।

- ओप्पो, वीवो, शाओमी जैसे मोबाइल, जिनका भारत के 66% स्मार्टफोन बाजार पर कब्ज़ा है, वे चीनी कंपनियां हैं।

- देश भर की सभी पॉवर कंपनियां अपने ज्यादातर इक्विपमेंट चीन के बनाए खरीदती हैं। TBEA जो भारत की सबसे बड़ी इलेक्ट्रिक इक्विपमेंट एक्सपोर्टर कंपनी है, वह एक चीन समर्थित कंपनी है, जिसकी फैक्टरी गुजरात में लगी है।
 
- देश में बनने वाली दवा के 66% इनग्रेडिएंट्स चीन से आते हैं।

- भारत में उत्पादित समान का चीन तीसरा सबसे बड़ा इम्पोर्टर देश है। 2014 के बाद भारत का चीन से इम्पोर्ट 55% और एक्सपोर्ट 22% बढ़ा है। भारत चीन के बीच लगभग 7.2 लाख करोड़ का व्यापार होता है, जिसमें 1.5 लाख करोड़ भारत एक्सपोर्ट और 5.8 लाख करोड़ का इम्पोर्ट करता है।

- इंडियन इलेक्ट्रिक ऑटो सेक्टर तो पूरी तौर पर चाइनीज कंपनी के चंगुल में आता जा रहा है। गिले, चेरि, ग्रेट वॉल मोटर्स, चंगान और बीकी फोटॉन जैसी चीनी कंपनियां अगले 3 साल में 5 बिलियन डॉलर यानी 35 हजार करोड़ से अधिक इन्वेस्टमेंट करने जा रहीं। इनमें कई की फैक्ट्रियां मुंबई और गुजरात में लग रही हैं।

- अडानी समूह ने 2017 में चीन की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक ईस्ट होप ग्रुप के साथ गुजरात में सौर ऊर्जा उपकरण के उत्पादन के लिए $ 300 मिलियन से अधिक का निवेश करने का समझौता किया था। रेन्युवेबल एनर्जी में चीन की लेनी, लोंगी, सीईटीसी जैसी कंपनियां भारत में 3.2 बिलियन डॉलर यानी 25 हजार करोड़ से अधिक इन्वेस्ट करने वाली हैं।

- आनंद कृष्णन के एक लेख के अनुसार 2014 में भारत चीन का इन्वेस्टमेंट 1.6 बिलियन था, जो मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद केवल 3 वर्ष यानी 2018 में पांच गुना बढ़कर करीब 8 बिलियन डॉलर हो गया।


- 2019 अक्टूबर में गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी ने धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र (SIR) में चीनी औद्योगिक पार्क स्थापित करने के लिए चाइना एसोसिएशन ऑफ स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (CASME) के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया, जिसमें उच्च तकनीक क्षेत्रों में चीन 10,500 करोड़ रुपये का निवेश  करेगा। यह प्रक्रिया उस वक़्त शुरू हुई जब प्रधानमंत्री गुजरात में शी जिनपिंग को झूला झूलाने के लिए लाए थे।

- हाल ही में दिल्ली-मेरठ ​रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) प्रोजेक्ट के अंडरग्राउंड स्ट्रेच बनाने के लिए 1100 करोड़ का ठेका चीनी कम्पनी SETC को मिला है। वहीं महाराष्ट्र सरकार के साथ चीनी वाहन निर्माता कंपनी ग्रेट वॉल मोटर्स (जीडब्ल्यूएम)  का 7600 करोड़ रुपये के निवेश का समझौता हुआ है।

तो ये बीएसएनएल और एमटीएनएल जैसी सरकारी कंपनियां, जो पहले से ही खस्ता हालात में हैं, वहां चीनी समान के उपयोग पर प्रतिबंध केवल फैंटा मंडली और चाटुकार मीडिया को चटखारे लगाने के लिए लगाया गया है। यदि सरकार सच में चीनी उत्पाद का बॉयकॉट करने लगे तो सबसे ज्यादा नुकसान उसके गुजराती परम मित्रों को ही होने वाला है, जो उसके चुनाव खर्चे उठाते हैं।

 यदि सच में भारत बॉयकॉट चीन चाहता है तो उसके लिए लंबी, कुशल और दूरदृष्टिसम्पन्न रणनीति की ज़रूरत पड़ेगी। लेकिन जो सरकार चीनी कंपनियों के लगातार बेताहाशा इन्वेस्टमेंट के बाद भी देश की चलती फिरती अर्थव्यवस्था को 8 से 3.5% जीडीपी पर ले आए, उससे आप बॉयकॉट चीन के मसले पर कितनी आशा रख सकते हैं?

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डॉ घपेश पुंडलिक राव ढवळे नागपुर
    ghapesh84@gmail.com
    M. 8600044560


Monday, June 15, 2020

रोहित वेमुला आत्महत्या "कायरता" और सुशांत आत्महत्या "दुःखद घटना" हो गयी.


सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के कुछ घंटे बाद ही प्रधानमन्त्री "मोदी जी" का दुःख भरा ट्विट आ गया, इसके अलावा तमाम उन व्यक्तिओ का दुःख भरा संदेश आ गया जो की;

"रोहित वेमुला की आत्महत्या पर इसे कायरता, मुर्खता, कह रहे थे, वेमुला को कायर कह रहे थे"

जबकि दोनों ही स्तिथि में सबसे कॉमन बात यह है की दोनों ही व्यक्ति;

"डिप्रेशन से ग्रस्त हो गये थे"

डिप्रेशन भी अलग अलग स्तिथि में अपना प्रभाव दिखाता है.

1.सुशांत सिंह का डिप्रेशन एकाएक मिली सफलता के बाद असफलताओ का सामना भी हो सकता है. जांच के बाद पता लगेगा की किस प्रकार का डिप्रेशन था. ऐसा डिप्रेशन भारत की अमूमन 135 करोड़ जनसँख्या को है, किसी को कम है और किसी को ज्यादा हो सकता है क्योंकि सन्तुष्ट तो मुकेश अम्बानी भी नही है। अनिल अंबानी कभी 6ठे नम्बर का अमीर व्यक्ति था, अब अपनी कम्पनियों को दिवालिया घोषित करवाने के लिए आवेदन कर रखा है।

2.रोहित वेमुला को जो डिप्रेशन था, वो डिप्रेशन उसका 25% जनसंख्या वाला एससी/एसटी समाज सैकड़ो वर्षो से धर्म के आधार पर झेल रहा है. बस उसका समाज धर्म के आधार पर इसे अपनी नियति समझकर झेलता रहा, लेकिन वर्ण व्यवस्था, जातिवादी माहोल से लडकर आत्मसम्मान व मनोबल प्राप्त कर चूका रोहित वेमुला जातिवादी मानसिकता के लोगो के दमन को झेल नही पाया इसलिए आत्महत्या का कदम उठा लिया.

3.रोहित वेमुला की आत्महत्या में स्मृति इरानी के पत्र पर काफी हंगामा हुआ था, और आज देखिए;

"स्मृति इरानी ने सुशांत सिंह राजपुर की आत्महत्या पर बड़ा ही दुःख प्रकट किया है"

4.इन सभी बातो में इतना तय है की सुशांत सिंह को जिस स्तर का डिप्रेशन रहा होगा, वो उस स्तर का नही होगा जिस उच्च स्तर का रोहित वेमुला को रहा है क्युकी इस डिप्रेशन की जड में भारत की "जातिवादी व्यवस्था" विधमान है. बकायदा रोहित वेमुला का सुसाइड पत्र अगर एक बार पढ़ लिया जाए तो जो बायस सामाजिक व्यवहार नही रखता है वो जरुर कहेगा की कितना दर्द था, कितना तनाव था, इतने तनाव में एक समाज सैकड़ो वर्षो से जी रहा है, यह ही अपने आप में बड़ी बात है.

4.फिर भी आत्महत्या का समर्थन नही किया जा सकता है. बाबा साहब को जब पारसी गेस्ट हाउस से सामान यह जानकर फैंक दिया गया की यह अछूत है, और उसके बाद बाबा साहब पार्क में "डिप्रेशन" में ही बैठे थे, लेकिन उन्होंने डिप्रेशन में अपने को मजबूत किया और ऐसा इतिहास लिख दिया जो हमेशा याद रखा जायेगा. फिर भी शोषित समाज सहित मुझे एक बेहतरीन एक्टिंग कर रहे सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या पर व्यक्तिगत तौर पर दुःख हुआ है. लेकिन क्या;

"रोहित वेमुला की डिप्रेशन में आत्महत्या पर भारतीय समाज को इतना ही दुःख हुआ?"

वास्तव में भारतीय जातिवादी समाज की सोच का यह ही बड़ा अंतर है, उन्हें अमरीका में जोर्ज फ्लाईड की हत्या पर दर्द होता है क्युकी अमरीका में वो स्वय ब्लैक की श्रेणी में आते है जबकि भारत में वो स्वय "श्वेत" अथार्त गोरे लोगो की मानसिकता रखकर एससी/एसटी पर जुल्म करते है, मजा लेते है, या फिर ऐसे जुल्म पर आँखे छुपा लेते है.

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डॉ. घपेश पुंडलिक राव ढवळे , नागपुर 
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Monday, June 8, 2020

बिरसा_मुंडा : जिनके उलगुलान और बलिदान ने लाई क्रांती.

हालात आज भी वैसे ही हैं जैसे बिरसा मुंडा के वक्त थे. आदिवासी खदेड़े जा रहे हैं, दिकू अब भी हैं. जंगलों के संसाधन तब भी असली दावेदारों के नहीं थे और न ही अब हैं

महान उपन्यासकार महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘जंगल के दावेदार’ का एक अंश :

सवेरे आठ बजे बीरसा मुंडा खून की उलटी कर, अचेत हो गया. बीरसा मुंडा- सुगना मुंडा का बेटा; उम्र पच्चीस वर्ष-विचाराधीन बंदी. तीसरी फ़रवरी को बीरसा पकड़ा गया था, किन्तु उस मास के अंतिम सप्ताह तक बीरसा और अन्य मुंडाओं के विरुद्ध केस तैयार नहीं हुआ था....क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की बहुत सी धाराओं में मुंडा पकड़ा गया था, लेकिन बीरसा जानता था उसे सज़ा नहीं होगी,’ डॉक्टर को बुलाया गया उसने मुंडा की नाड़ी देखी. वो बंद हो चुकी थी. बीरसा मुंडा नहीं मरा था, आदिवासी मुंडाओं का ‘भगवान’ मर चुका था.

आदिवासियों का संघर्ष अट्ठारहवीं शताब्दी से चला आ रहा है. 1766 के पहाड़िया-विद्रोह से लेकर 1857 के ग़दर के बाद भी आदिवासी संघर्षरत रहे. सन 1895 से 1900 तक बीरसा या बिरसा मुंडा का महाविद्रोह ‘ऊलगुलान’ चला. आदिवासियों को लगातार जल-जंगल-ज़मीन और उनके प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल किया जाता रहा और वे इसके खिलाफ आवाज उठाते रहे.

1895 में बिरसा ने अंग्रेजों की लागू की गयी ज़मींदारी प्रथा और राजस्व-व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ाई के साथ-साथ जंगल-ज़मीन की लड़ाई छेड़ी थी. बिरसा ने सूदखोर महाजनों के ख़िलाफ़ भी जंग का ऐलान किया. ये महाजन, जिन्हें वे दिकू कहते थे, क़र्ज़ के बदले उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर लेते थे. यह मात्र विद्रोह नहीं था. यह आदिवासी अस्मिता, स्वायतत्ता और संस्कृति को बचाने के लिए संग्राम था.

आदिवासी और स्त्री मुद्दों पर अपने काम के लिए चर्चित साहित्यकार रमणिका गुप्ता अपनी किताब ‘आदिवासी अस्मिता का संकट’ में लिखती हैं, ‘आदिवासी इलाकों के जंगलों और ज़मीनों पर, राजा-नवाब या अंग्रेजों का नहीं जनता का कब्ज़ा था. राजा-नवाब थे तो ज़रूर, वे उन्हें लूटते भी थे, पर वे उनकी संस्कृति और व्यवस्था में दखल नहीं देते थे. अंग्रेज़ भी शुरू में वहां जा नहीं पाए थे. रेलों के विस्तार के लिए, जब उन्होंने पुराने मानभूम और दामिन-ई-कोह (वर्तमान में संथाल परगना) के इलाकों के जंगले काटने शुरू कर दिए और बड़े पैमाने पर आदिवासी विस्थापित होने लगे, आदिवासी चौंके और मंत्रणा शुरू हुई.’ वे आगे लिखती हैं, ‘अंग्रेजों ने ज़मींदारी व्यवस्था लागू कर आदिवासियों के वे गांव, जहां व सामूहिक खेती किया करते थे, ज़मींदारों, दलालों में बांटकर, राजस्व की नयी व्यवस्था लागू कर दी. इसके विरुद्ध बड़े पैमाने पर लोग आंदोलित हुए और उस व्यवस्था के ख़िलाफ़ विद्रोह शुरू कर दिए.’

बिरसा मुंडा को उनके पिता ने मिशनरी स्कूल में भर्ती किया था जहां उन्हें ईसाइयत का पाठ पढ़ाया गया. कहा जाता है कि बिरसा ने कुछ ही दिनों में यह कहकर कि ‘साहेब साहेब एक टोपी है’ स्कूल से नाता तोड़ लिया. 1890 के आसपास बिरसा वैष्णव धर्म की ओर मुड गए. जो आदिवासी किसी महामारी को दैवीय प्रकोप मानते थी उनको वे महामारी से बचने के उपाय समझाते. मुंडा आदिवासी हैजा, चेचक, सांप के काटने बाघ के खाए जाने को ईश्वर की मर्ज़ी मानते, बिरसा उन्हें सिखाते कि चेचक-हैजा से कैसे लड़ा जाता है. बिरसा अब धरती आबा यानी धरती पिता हो गए थे.

धीरे-धीरे बिरसा का ध्यान मुंडा समुदाय की ग़रीबी की ओर गया. आज की तरह ही आदिवासियों का जीवन तब भी अभावों से भरा हुआ था. न खाने को भात था न पहनने को कपड़े. एक तरफ ग़रीबी थी और दूसरी तरफ ‘इंडियन फारेस्ट एक्ट’ 1882 ने उनके जंगल छीन लिए थे. जो जंगल के दावेदार थे, वही जंगलों से बेदख़ल कर दिए गए. यह देख बिरसा ने हथियार उठा लिए. उलगुलान शुरू हो गया था.

अपनों का धोखा

संख्या और संसाधन कम होने की वजह से बिरसा ने छापामार लड़ाई का सहारा लिया. रांची और उसके आसपास के इलाकों में पुलिस उनसे आतंकित थी. अंग्रेजों ने उन्हें पकड़वाने के लिए पांच सौ रुपये का इनाम रखा था जो उस समय बहुत बड़ी रकम थी. बिरसा मुंडा और अंग्रेजों के बीच अंतिम और निर्णायक लड़ाई 1900 में रांची के पास दूम्बरी पहाड़ी पर हुई. हज़ारों की संख्या में मुंडा आदिवासी बिरसा के नेतृत्व में लड़े. पर तीर-कमान और भाले कब तक बंदूकों और तोपों का सामना करते? लोग बेरहमी से मार दिए गए. 25 जनवरी, 1900 में स्टेट्समैन अखबार के मुताबिक इस लड़ाई में 400 लोग मारे गए थे.

अंग्रेज़ जीते तो सही पर बिरसा मुंडा हाथ नहीं आए. लेकिन जहां बंदूकें और तोपें काम नहीं आईं वहां पांच सौ रुपये ने काम कर दिया. बिरसा की ही जाति के लोगों ने उन्हें पकड़वा दिया!

महाश्वेता देवी अपने महान कालजयी उपन्यास ‘जंगल के दावेदार’ में लिखती हैं, ‘अगर उसे उसकी धरती पर दो वक़्त दो थाली घाटो, बरस में चार मोटे कपड़े, जाड़े में पुआल-भरे थैले का आराम, महाजन के हाथों छुटकारा, रौशनी करने के लिए महुआ का तेल, घाटो खाने के लिए काला नमक, जंगल की जड़ें और शहद, जंगल के हिरन और खरगोश-चिड़ियों आदि का मांस-ये सब मिल जाते तो बीरसा मुंडा शायद भगवान न बनता.’

‘उलगुलान’ के रुमानीवाद को साहित्य और जंगल से निकलकर साम्यवाद के हाथों में लाने वाले थे चारू मजुमदार, कनु सान्याल और जगत संथाल. इन्होंने इसे नक्सलवाद का रंग दे दिया. ‘नक्सलवाद’ शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से हुई है. साम्यवाद के सिद्धान्त से फ़ौरी तौर पर समानता रखने वाला आदिवासी आंदोलन कई मायनों में अलग भी था. बाद में इसे माओवाद से जोड़ दिया गया.

हालात तो आज भी नहीं बदले हैं. आदिवासी गांवों से खदेड़े जा रहे हैं, दिकू अब भी हैं. जंगलों के संसाधन तब भी असली दावेदारों के नहीं थे और न ही अब हैं. आदिवासियों की समस्याएं नहीं बल्कि वे ही खत्म होते जा रहे हैं. सब कुछ वही है. जो नहीं है तो आदिवासियों के ‘भगवान’ बिरसा मुंडा.

ऐसे में कवि भुजंग मेश्राम की पंक्तियां याद आती हैं :

‘बिरसा तुम्हें कहीं से भी आना होगा
घास काटती दराती हो या लकड़ी काटती कुल्हाड़ी
यहां-वहां से, पूरब-पश्चिम, उत्तर दक्षिण से
कहीं से भी आ मेरे बिरसा
खेतों की बयार बनकर
लोग तेरी बाट जोहते.’

By
Dr. Ghapesh pundalikrao Dhawal. Nagpur
      ghapesh84@gmail.com
       8600044560

Sunday, June 7, 2020

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कानुन (मनरेगा)

 राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कानून, 2005 (मनरेगा) एक 
क्रांतिकारी और तर्कसंगत परिवर्तन का जीता जागता उदाहरण है। यह क्रांतिकारी बदलाव का सूचक इसलिए है क्योंकि इस कानून ने गरीब से गरीब व्यक्ति के हाथों को काम व आर्थिक ताकत दे भूख व गरीबी पर प्रहार किया। यह तर्कसंगत है क्योंकि यह पैसा सीधे उन लोगों के हाथों में पहुंचाता है जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। विरोधी विचारधारा वाली केंद्र सरकार के छः साल में व उससे पहले भी, लगातार मनरेगा की उपयोगिता साबित हुई है। मोदी सरकार ने इसकी आलोचना की, इसे कमजोर करने की कोशिश की, लेकिन अंत में मनरेगा के लाभ व सार्थकता को स्वीकारना पड़ा। कांग्रेस सरकार द्वारा स्थापित की गई सार्वजनिक वितरण प्रणाली के साथ-साथ मनरेगा सबसे गरीब व कमजोर नागरिकों को भूख तथा गरीबी से बचाने के लिए अत्यंत कारगर है। खासतौर से कोरोना महामारी के संकट के दौर में यह और ज्यादा  है।


 हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश की संसद द्वारा सितंबर, 2005 में पारित मनरेगा कानून एक लंबे जन आंदोलन तथा सिविल सोसायटी द्वारा उठाई जा रही मांगों का परिणाम है। कांग्रेस पार्टी ने जनता की इस आवाज को सुना व अमली जामा पहनाया। यह हमारे 2004 के चुनावी घोषणापत्र का संकल्प बना और हममें से इस योजना के क्रियान्वयन के लिए अधिक से अधिक दबाव डालने वाले हर व्यक्ति को गर्व है कि यूपीए सरकार ने इसे लागू कर दिखाया।

 इसका एक सरल सिद्धांत है: भारत के गांवों में रहने वाले किसी भी नागरिक को अब काम मांगने का कानूनी अधिकार है और सरकार द्वारा उसे न्यूनतम मजदूरी के साथ कम से कम 100 दिनों तक काम दिए जाने की गारंटी होगी। इसकी उपयोगिता बहुत जल्द साबित भी हुई। यह जमीनी स्तर पर, मांग द्वारा संचालित, काम का अधिकार देने वाला कार्यक्रम है, जो अपने स्केल एवं आर्किटेक्चर में अभूतपूर्व है तथा इसका उद्देश्य गरीबी मिटाना है। मनरेगा की शुरुआत के बाद 15 सालों में इस योजना ने लाखों लोगों को भूख व गरीबी के कुचक्र से बाहर निकाला है।

महात्मा गांधी ने कहा था, ‘‘जब आलोचना किसी आंदोलन को दबाने में विफल हो जाती है, तो उस आंदोलन को स्वीकृति व सम्मान मिलना शुरू हो जाता है’’। स्वतंत्र भारत में महात्मा गांधी की इस बात को साबित करने का मनरेगा से ज्यादा अच्छा उदाहरण और कोई नहीं। पद संभालने के बाद, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को भी समझ आया कि मनरेगा को बंद किया जाना व्यवहारिक नहीं। इसीलिए उन्होंने आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग कर कांग्रेस पार्टी पर हमला बोला और इस योजना को ‘कांग्रेस पार्टी की विफलता का एक जीवित स्मारक’ तक कह डाला। पिछले सालों में मोदी सरकार ने मनरेगा को खत्म करने, खोखला करने व कमजोर करने की पूरी कोशिश की। लेकिन मनरेगा के सजग प्रहरियों, अदालत एवं संसद में विपक्षी दलों के भारी दबाव के चलते सरकार को पीछे हटने को मजबूर होना पड़ा। इसके बाद केंद्र सरकार ने मनरेगा को स्वच्छ भारत तथा प्रधानमंत्री आवास योजना जैसे कार्यक्रमों से जोड़कर इसका स्वरूप बदलने की कोशिश की, जिसे उन्होंने सुधार कहा। लेकिन, वास्तव में यह कांग्रेस पार्टी की योजनाओं का नाम बदलने का एक प्रयास मात्र था। यह और बात है कि मनरेगा श्रमिकों को भुगतान किए जाने में अत्यंत देरी की गई तथा उन्हें काम तक दिए जाने से इंकार कर दिया गया।


कोविड-19 महामारी और इससे उत्पन्न आर्थिक संकट ने मोदी सरकार को वास्तविकता का अहसास करवाया है। पहले से ही चल रहे अभूतपूर्व आर्थिक संकट व मंदी की मार झेल रही अर्थव्यवस्था ने सरकार को आभास दिलाया कि पिछली यूपीए सरकार के फ्लैगशिप ग्रामीण राहत कार्यक्रमों को दोबारा शुरू करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। काम स्वयं बोलता है। चाहे देर से ही सही, वित्तमंत्री द्वारा हाल में ही मनरेगा का बजट बढ़ा एक लाख करोड़ रु. से ज्यादा का कुल आवंटन किए जाने की घोषणा ने इस बात को साबित कर दिया है। अकेले मई 2020 में ही 2.19 करोड़ परिवारों ने इस कानून के तहत काम की मांग की, जो आठ सालों में सबसे ज्यादा है।


 कांग्रेस पार्टी के कार्यक्रमों को यथावत स्वीकार करने के लिए मजबूर मोदी सरकार अभी भी कमियां खोजने के लिए कुतर्कों का जाल बुनने में लगी है। लेकिन पूरा देश जानता है कि दुनिया के इस सबसे बड़े जन आंदोलन ने किस प्रकार न केवल लाखों भारतीयों को गरीबी के कुचक्र से बाहर निकाला, अपितु पंचायती राज संस्थाओं का स्वरूप बदल दिया, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कम करने में मदद की तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित किया। इसने सभी के लिए समान वेतन सुनिश्चित कर, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों तथा कमजोर वर्गों को सशक्त बनाकर एक नए सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत की। इसने उन्हें संगठित होने की ताकत दी और उन्हें सम्मान व स्वाभिमानपूर्ण जीवन प्रदान किया। आज के संकट में भारत को सशक्त बनाने के लिए इन तथ्यों को जानना बहुत आवश्यक है।


 आज निराश मजदूर व कामगार विभिन्न शहरों से समूहों में अपने गाँवों की ओर लौट रहे हैं। उनके पास न तो रोजगार है और न ही एक सुरक्षित भविष्य। जब अभूतपूर्व संकट के बादल मंडरा रहे हैं, तो मनरेगा की जरूरत व महत्व पहले से कहीं और ज्यादा है। इन मेहनतकशों का विश्वास पुनः स्थापित करने के लिए राहत कार्य उन पर केंद्रित होने चाहिए। सबसे पहला काम उन्हें मनरेगा का जॉब कार्ड जारी किया जाना है। श्री राजीव गांधी ने अपने विशेष प्रयासों द्वारा जिस पंचायती राज तंत्र को सशक्त बनाने का संघर्ष किया, आज मनरेगा को लागू करने की मुख्य भूमिका उन्हीं पंचायतों को दी जानी चाहिए, क्योंकि यह कोई केंद्रीकृत कार्यक्रम नहीं है। जन कल्याण की योजनाएं चलाने के लिए पंचायतों को और मजबूत किया जाए तथा प्राथमिकता से पैसा पंचायतों को दिया जाए। ग्राम सभा यह निर्धारित करे कि किस प्रकार का काम किया जाए। क्योंकि स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधि ही जमीनी हकीकत, श्रमिकों की स्थिति व उनकी जरूरतों को समझते हैं। वो अच्छी तरह जानते हैं कि गाँव व स्थानीय अर्थव्यवस्था की जरूरतों के अनुरूप, अपने बजट को कहाँ खर्च करना है। श्रमिकों के कौशल का उपयोग ऐसी टिकाऊ संरचनाओं के निर्माण के लिए किया जाना चाहिए, जिनसे कृषि उत्पादकता में सुधार हो, ग्रामीण आय में वृद्धि हो तथा पर्यावरण की रक्षा हो।


संकट के इस वक्त केंद्र सरकार को पैसा सीधा लोगों के हाथों में पहुंचाना चाहिए तथा सब प्रकार की बकाया राशि, बेरोजगारी भत्ता व श्रमिकों का भुगतान लचीले तरीके से बगैर देरी के करना चाहिए। मोदी सरकार ने मनरेगा के तहत कार्यदिवसों की संख्या बढ़ाकर 200 करने तथा कार्यस्थल पर ही पंजीकरण कराने की अनुमति देने की मांगों को नजरंदाज कर दिया है। मनरेगा के तहत ओपन-एंडेड फंडिंग सुनिश्चित होनी चाहिए, जैसा पहले होता था।

 मनरेगा की उपयोगिता बार बार साबित हुई है क्योंकि यूपीए सरकार के दौरान इसमें निरंतर सुधार व बढ़ोत्तरी हुई। विस्तृत सोशल ऑडिट, पारदर्शिता, पत्रकारों व बुद्धिजीवियों द्वारा जाँच-परख व लोकपाल की नियुक्ति के माध्यम से सरकार व नागरिकों ने मिलकर इसे मौजूदा आकार दिया। राज्य सरकारों ने सर्वश्रेष्ठ विधियों को अपनाकर इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह पूरी दुनिया में गरीबी उन्मूलन के एक मॉडल के रूप में प्रसिद्ध हो गया।


अनिच्छा से ही सही, मोदी सरकार इस कार्यक्रम का महत्व समझ चुकी है। मेरा सरकार से निवेदन है कि यह वक्त देश पर छाए संकट का सामना करने का है, न कि राजनीति करने का। यह वक्त भाजपा बनाम कांग्रेस का नहीं। आपके पास एक शक्तिशाली तंत्र है, कृपया इसका उपयोग कर आपदा के इस वक्त भारत के नागरिकों की मदद कीजिए।

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डॉ. घपेश पुंडलीकराव ढळळे
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